महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे. (Aaj Tak)

थाणे जिले के अंबरनाथ में स्थानीय निकाय चुनाव के बाद राजनीतिक पटल पर नया मोड़ आ गया है। बीजेपी, कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर ‘अंबरनाथ विकास आघाड़ी’ नाम से गठबंधन बना लिया है। इस गठबंधन में शिंदे गुट वाली शिवसेना को deliberately बाहर रखा गया, जबकि 20 दिसंबर को हुए नगर पालिका चुनावों में शिंदे गुट सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरा था

चुनाव परिणामों के अनुसार, शिंदे गुट की शिवसेना को 27 सीटें मिली थीं, जो बहुमत से केवल चार कम थीं। बीजेपी ने 14, कांग्रेस ने 12 और एनसीपी ने 4 सीटें जीतीं, जबकि दो निर्दलीय पार्षद निर्वाचित हुए। एक निर्दलीय पार्षद के समर्थन से नए गठबंधन की संख्या 32 तक पहुँच गई, जिससे शिवसेना को सत्ता में भागीदारी से बाहर होना पड़ा।

इस घटनाक्रम पर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने आजतक के ‘मुंबई मंथन 2026’ कार्यक्रम में कहा कि अंबरनाथ में बने बीजेपी–कांग्रेस गठबंधन उनकी विचारधारा के खिलाफ है। शिंदे ने बताया कि उन्होंने इस मुद्दे पर पहले राज्य बीजेपी अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण से और फिर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से चर्चा की। उन्होंने कहा कि इस गठबंधन से उन्हें दुख पहुंचा है, और उन्होंने मुख्यमंत्री को अपने विचारधारा विरोधी होने की बात भी बताई।

हालांकि, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस मामले में किसी भी तरह के विवाद की बात को खारिज किया। उन्होंने कहा कि उनके और शिंदे के बीच सब कुछ सामान्य है और कोई अहंकार या मनमुटाव नहीं है। फडणवीस ने यह भी स्पष्ट किया कि अंबरनाथ में गठबंधन केवल रणनीतिक निर्णय था, क्योंकि स्थानीय निकाय चुनाव आमतौर पर बीजेपी के कार्यकर्ताओं के स्तर पर लड़े जाते हैं।

शिंदे ने इस अवसर का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक अहमियत को भी रेखांकित करने के लिए किया। उन्होंने कहा कि वे ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो किसी गठबंधन या असहमति से डरें। उन्होंने 2022 की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय उन्होंने उद्धव ठाकरे की अध्यक्षता वाली शिवसेना को तोड़ा और अब पार्टी और उसके सिंबल उसी के पास हैं। शिंदे ने इसे एक ‘बड़ा ऑपरेशन’ करार दिया, जिसमें उन्होंने साहसिक कदम उठाए थे।

शिंदे ने बीजेपी–कांग्रेस गठबंधन को पाखंडी और अवसरवादी भी बताया। उनका कहना था कि विपक्ष अक्सर राज्य की सत्तारूढ़ महायुति पर सवाल उठाता है, लेकिन जब अंबरनाथ में वही कांग्रेस और बीजेपी साथ आए, तब उनकी नैतिकता कहां थी। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष को पहले अपने ही अपवित्र गठबंधनों का जवाब देना चाहिए, बजाय दूसरों को उपदेश देने के।

7 जनवरी को गठबंधन बनने के बाद शिंदे गुट की शिवसेना ने इसे “गठबंधन धर्म का विश्वासघात” बताया। पार्टी नेताओं ने कहा कि अंबरनाथ में यह व्यवस्था जानबूझकर उनके पक्ष को सत्ता से दूर रखने के लिए की गई, जबकि शिंदे गुट के पास सबसे अधिक जनादेश था।

इस असहज स्थिति में कांग्रेस को भी विरोध का सामना करना पड़ा। पार्टी ने अपने 12 नवनिर्वाचित पार्षदों और ब्लॉक अध्यक्ष को निलंबित कर दिया। इसके बाद ये 12 पार्षद देर रात बीजेपी में शामिल हो गए, जिससे गठबंधन में और मजबूती आई।

विशेषज्ञों का मानना है कि अंबरनाथ का यह गठबंधन महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया सियासी संकेत है। यह दिखाता है कि स्थानीय निकाय चुनावों में भी बड़ी पार्टियों के बीच रणनीतिक गठबंधनों और सत्ता समीकरणों का खेल चलता रहता है। राजनीतिक विश्लेषक यह भी कह रहे हैं कि शिंदे गुट अब भी राज्य स्तर पर अपनी पकड़ बनाए रखने की पूरी कोशिश कर रहा है, और यह गठबंधन उनके लिए एक चेतावनी की तरह काम कर सकता है।

इस घटनाक्रम से स्पष्ट है कि महाराष्ट्र में सियासत लगातार बदल रही है, और पारंपरिक दलों के बीच नए गठबंधन और विश्वासघात की राजनीति आम हो गई है। अंबरनाथ का मामला यह बताता है कि चुनाव परिणामों में सबसे बड़ी पार्टी होना हमेशा सत्ता में भागीदारी की गारंटी नहीं देता।

अगले कुछ हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि शिंदे गुट और बीजेपी–कांग्रेस–एनसीपी गठबंधन के बीच राजनीतिक तालमेल और तनाव किस रूप में सामने आता है। अंबरनाथ विकास आघाड़ी ने स्थानीय स्तर पर सत्ता का नियंत्रण तो पा लिया है, लेकिन इससे बड़े राजनीतिक नतीजे और राज्य स्तर पर गठबंधन समीकरणों पर क्या असर पड़ता है, यह आने वाला समय ही बताएगा।

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