Delhi court frames charges against Lalu Yadav, Rabri, Tejashwi, Tej Pratap, others in Railways land-for-jobs case कोर्ट ने फैसला सुनाया कि कुल 98 बचे हुए आरोपियों में से 46 लोगों (जिनमें लालू यादव और उनका परिवार शामिल है) के खिलाफ आरोप तय किए जा रहे हैं. (फोटो- PTI)

राउज एवेन्यू कोर्ट की सख्त टिप्पणी: दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने शुक्रवार, 9 जनवरी को बहुचर्चित रेलवे ‘जमीन के बदले नौकरी’ घोटाले में बड़ा और अहम फैसला सुनाया। अदालत ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के प्रमुख और पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी और पूर्व बिहार मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, बेटे तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव, बेटी मीसा भारती सहित कुल 46 आरोपियों के खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप तय कर दिए। यह फैसला स्पेशल जज (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) विशाल गोगने ने सुनाया।

Delhi court frames charges against Lalu Yadav, Rabri, Tejashwi, Tej Pratap, others in Railways land-for-jobs case
कोर्ट ने फैसला सुनाया कि कुल 98 बचे हुए आरोपियों में से 46 लोगों (जिनमें लालू यादव और उनका परिवार शामिल है) के खिलाफ आरोप तय किए जा रहे हैं. (फोटो- PTI)

कोर्ट ने अपने आदेश में बेहद कड़ी भाषा का इस्तेमाल करते हुए कहा कि लालू यादव ने रेल मंत्रालय को अपनी “जागीर” की तरह इस्तेमाल किया। अदालत के मुताबिक, इस पूरे मामले में लालू यादव और उनके परिवार ने एक संगठित अपराधी गिरोह की तरह काम किया और सार्वजनिक पद व सरकारी नौकरियों का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए किया गया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में आरोपियों की ओर से दायर डिस्चार्ज याचिकाएं पूरी तरह से बेबुनियाद हैं और उनमें कोई दम नहीं है।

अदालत ने लालू यादव पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप तय किए हैं। इसके अलावा भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के आरोप भी लगाए गए हैं। कोर्ट ने कहा कि चार्जशीट और जांच में सामने आए सबूत प्रथम दृष्टया यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि यह कोई साधारण प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी।

कोर्ट के अनुसार, यह मामला उस समय का है जब लालू प्रसाद यादव 2004 से 2009 के बीच केंद्र सरकार में रेल मंत्री थे। CBI की जांच में आरोप लगाया गया है कि इस अवधि के दौरान रेलवे में ग्रुप-डी की नौकरियों के लिए किसी भी तरह की पारदर्शी और वैधानिक भर्ती प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। इसके बजाय, नौकरी चाहने वालों या उनके परिजनों से जमीन लेकर उन्हें रेलवे में नियुक्तियां दी गईं।

जांच एजेंसियों का दावा है कि नौकरी पाने वाले लोगों या उनके रिश्तेदारों ने पटना और उसके आसपास की कीमती जमीनें लालू यादव के परिवार के सदस्यों या उनसे जुड़ी कंपनियों को बेहद कम कीमत पर बेचीं या फिर उपहार के रूप में ट्रांसफर कर दीं। कोर्ट ने इस पूरे लेन-देन को स्पष्ट रूप से ‘क्विड प्रो क्वो’ यानी “कुछ दो, कुछ लो” का मामला बताया। अदालत के शब्दों में, सार्वजनिक नौकरियों को सौदेबाजी के औजार की तरह इस्तेमाल किया गया।

स्पेशल जज विशाल गोगने ने अपने आदेश में कहा कि चार्जशीट से यह साफ झलकता है कि लालू यादव के करीबी लोगों ने रेलवे में नियुक्तियों के बदले न सिर्फ जमीनें दिलवाईं, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में प्लेसमेंट भी कराए गए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस तरह की गतिविधियां लोकतांत्रिक व्यवस्था और सार्वजनिक संस्थानों की पवित्रता पर सीधा हमला हैं।

हालांकि, यादव परिवार लगातार इन आरोपों को खारिज करता रहा है। उनका कहना है कि यह पूरा मामला राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है और विपक्षी दलों के इशारे पर केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग किया जा रहा है। लालू यादव और उनके परिवार का दावा है कि जमीन के सौदे पूरी तरह कानूनी थे और उनका रेलवे की नौकरियों से कोई संबंध नहीं था।

इस बीच, प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग के एंगल से जांच कर रहा है। ED का आरोप है कि इस घोटाले से अर्जित संपत्तियां अपराध की आय (Proceeds of Crime) हैं। एजेंसी अब तक 600 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की संपत्तियों को जब्त कर चुकी है, जिन्हें इसी केस से जुड़ा हुआ बताया गया है।

कोर्ट ने अंत में साफ किया कि कुल 98 बचे हुए आरोपियों में से 46 के खिलाफ आरोप तय किए जा रहे हैं, जबकि 52 लोगों को इस मामले में पर्याप्त सबूत न मिलने के आधार पर बरी कर दिया गया है। अदालत का यह फैसला आने वाले समय में न सिर्फ लालू यादव और उनके परिवार के लिए, बल्कि बिहार की राजनीति के लिए भी बेहद अहम माना जा रहा है।

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